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नीतीश कुमार फिर बने CM: बिहार की राजनीति में क्यों फेल हुआ 'महाराष्ट्र फॉर्मूला'?

JantaTimes Staff19 November 2025 at 1:39 pm
सीटों में मामूली अंतर होने के बावजूद, बीजेपी ने बिहार में नीतीश कुमार को ही मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया है, जिससे 'महाराष्ट्र फॉर्मूला' लागू होने के सभी कयास गलत साबित हुए। इसके पीछे बीजेपी की गहरी राजनीतिक मजबूरी और दूरगामी रणनीति छिपी है।
नीतीश कुमार फिर बने CM: बिहार की राजनीति में क्यों फेल हुआ 'महाराष्ट्र फॉर्मूला'?

बिहार की राजनीति में एक बार फिर नीतीश कुमार का 'सुशासन' वाला दांव चला है। सत्ता के गलियारों में जोरों से चर्चा थी कि बीजेपी इस बार महाराष्ट्र वाला फॉर्मूला लागू करेगी—यानी ज़्यादा सीटें होने पर अपना मुख्यमंत्री बनाएगी। लेकिन, इन तमाम अटकलों पर विराम लग गया है। बीजेपी ने न सिर्फ नीतीश कुमार को NDA विधायक दल का नेता चुना, बल्कि उन्हें एक बार फिर से बिहार का मुख्यमंत्री बनाने का फैसला कर लिया। वहीं, बीजेपी के फायरब्रांड नेता सम्राट चौधरी को एक बार फिर डिप्टी सीएम की ही जिम्मेदारी मिलने की संभावना है।

यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है। जब बीजेपी ने महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की पार्टी से काफी ज़्यादा सीटें जीतकर मुख्यमंत्री का पद अपने पास रखा था, तो बिहार में सिर्फ चार सीटों के अंतर पर (बीजेपी 89, जेडीयू 85) नीतीश कुमार को सीएम क्यों बनने दिया जा रहा है? आखिर वह कौन-सी मजबूरियां हैं जिन्होंने बीजेपी को अपना मुख्यमंत्री बनाने के प्लान से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया? इसे समझने के लिए हमें बीजेपी की मल्टी-लेवल रणनीति और बिहार के ग्राउंड रियलिटी को देखना होगा।

1. दूरगामी सीट-शेयरिंग की रणनीति: बीजेपी ने 2025 के चुनाव में जेडीयू के साथ 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा। यह 'बड़े भाई' और 'छोटे भाई' के समीकरण को खत्म करने की एक सोची-समझी कोशिश थी। सीट शेयरिंग से पहले ही यह लगभग तय हो गया था कि गठबंधन का चेहरा नीतीश कुमार ही रहेंगे। बीजेपी शायद यह जोखिम नहीं उठाना चाहती थी कि सीएम पद के लिए उन्हें परेशान करके गठबंधन में अस्थिरता पैदा की जाए। अमित शाह और राजनाथ सिंह के बयान कि 'मुख्यमंत्री का फैसला संसदीय बोर्ड करेगा', सिर्फ गठबंधन सहयोगियों और नीतीश विरोधी गुट को साधने की एक रणनीति थी, ताकि कोई नाराजगी न हो।

2. ईबीसी (EBC) वोट बैंक पर नीतीश की मजबूत पकड़: बिहार में बीजेपी ने ओबीसी वोटों में तो अपनी पैठ बना ली है, लेकिन अति पिछड़ा वर्ग (EBC) पर आज भी नीतीश कुमार का प्रभाव सबसे ज्यादा है। तेजस्वी यादव भी इस वोट बैंक में सेंध नहीं लगा पाए हैं। बीजेपी जानती है कि नीतीश को सीएम पद से हटाने का मतलब है इस विशाल ईबीसी वोट बैंक को नाराज़ करना, जिसका सीधा फायदा विपक्ष को हो सकता है। यह जोखिम बीजेपी 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले कतई नहीं लेना चाहती। सम्राट चौधरी को डिप्टी सीएम बनाना इसी ईबीसी समुदाय को साधने की एक कोशिश है, लेकिन नीतीश का 'सुशासन' वाला चेहरा अभी भी बीजेपी के लिए बहुत ज़रूरी है।

3. महाराष्ट्र और बिहार के नतीजों में बड़ा अंतर: महाराष्ट्र में बीजेपी ने 132 सीटें जीती थीं, जबकि एकनाथ शिंदे की पार्टी 57 पर सिमट गई थी। यह अंतर बहुत बड़ा था। बिहार में बीजेपी और जेडीयू के बीच सिर्फ चार सीटों का फासला है। 2020 में भी ज़्यादा सीटें होने पर बीजेपी ने नीतीश को ही सीएम बनाया था, तो अब इतने कम अंतर पर सीएम बदलना अनावश्यक अस्थिरता पैदा करता। इसके अलावा, बीजेपी के पास अभी तक देवेंद्र फडणवीस जैसा कोई सर्वमान्य नेता नहीं है जो अकेले दम पर नीतीश कुमार की 'सुशासन' की विरासत को आगे ले जा सके। सम्राट चौधरी को इतना बड़ा दांव देने से पहले पार्टी भविष्य के चुनाव को देखते हुए फूंक-फूंक कर कदम रख रही है।

4. राष्ट्रीय गठबंधन और छवि की चिंता: बीजेपी अपनी राष्ट्रीय छवि को भी बचाकर रखना चाहती है। अगले साल तमिलनाडु जैसे राज्यों में चुनाव होने हैं। अगर बीजेपी नीतीश कुमार को हटाती तो यह संदेश जा सकता था कि वह अपने छोटे सहयोगियों को दबाती है। इससे ई. पलानीस्वामी (AIADMK) जैसे सहयोगी दूर हट सकते थे। नीतीश को सीएम बनाए रखकर बीजेपी ने गठबंधन धर्म का पालन करने का एक सकारात्मक संदेश दिया है, जो भविष्य के गठबंधन समझौतों के लिए ज़रूरी है।

कुल मिलाकर, बीजेपी का यह फैसला सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है। यह एक दूरगामी राजनीतिक फैसला है। बीजेपी जानती है कि भविष्य में लालू-राबड़ी शासन के 'जंगलराज' की तुलना में नीतीश कुमार के 'सुशासन' की विरासत को ही अपना नाम करना है। इस वक्त नीतीश को डिस्टर्ब करना बीजेपी के लिए राजनीतिक जोखिम भरा होता।

“बिहार में स्थिरता और सामाजिक समीकरण को साधने के लिए बीजेपी ने फिलहाल नीतीश कुमार पर ही भरोसा जताना सही समझा है। यह गठबंधन की राजनीति और भविष्य के चुनावों की मांग है।”
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