Punjab Politics on Guru Tegh Bahadur Anniversary: Unity टूटी, विवाद बढ़े

Guru Tegh Bahadur Shaheedi Diwas Politics के बीच पंजाब में धार्मिक श्रद्धा और राजनीतिक तनाव एक दूसरे में उलझते नजर आए। इस पवित्र अवसर पर एकजुट होकर श्रद्धांजलि देने की उम्मीद थी, लेकिन हालात इसके बिल्कुल उलट दिखाई दिए।
राज्य में लंबे समय से चल रहे राजनीतिक मतभेद इस आयोजन के दौरान और अधिक स्पष्ट हो गए। मुख्यमंत्री भगवंत मान और अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गरगज के बीच जारी विवाद ने आयोजनों की दिशा ही बदल दी। मान ने गरगज की नियुक्ति को लेकर सवाल खड़े किए, यह दावा करते हुए कि उनके चयन में धार्मिक मर्यादाओं का पालन नहीं हुआ।
इस विवाद का सीधा असर आयोजन संरचना पर दिखा। आनंदपुर साहिब में एक ही दिन तीन मंच तैयार किए गए—एक पंजाब सरकार का, दूसरा SGPC और अकाली दल का, और तीसरा पहली बार आयोजित भाजपा का स्वतंत्र समारोह। ये आयोजन एक ही शहर में होने के बावजूद भी एक दूसरे से दूरी पर खड़े दिखाई दिए, मानो राजनीतिक सीमाएं धार्मिक कार्यक्रमों पर भी हावी हों।
AAP सरकार ने कई दिनों तक चलने वाली कार्यक्रम श्रृंखला बनाई, जिसमें अधिकतर मंचों पर भगवंत मान और अरविंद केजरीवाल ही नज़र आए। राष्ट्रीय स्तर के किसी बड़े नेता की उपस्थिति नहीं दिखी। वहीं SGPC और अकाली दल ने पूरे सप्ताह पारंपरिक शैली में धार्मिक आयोजन किए, जिसमें उनकी संगठनात्मक पकड़ साफ नजर आई।
इस बार का सबसे अलग दृश्य भाजपा का स्वतंत्र धार्मिक आयोजन था। अकाली दल से गठबंधन टूटने के बाद पार्टी ने पहली बार सिख इतिहास से जुड़ा अपना कार्यक्रम किया। आनंदपुर साहिब में आयोजित कीर्तन दरबार में सुनील जाखड़, अश्विनी शर्मा और इकबाल सिंह लालपुरा जैसे नेता मौजूद रहे। हालांकि अमरिंदर सिंह नहीं आए, लेकिन उनकी पत्नी प्रणीत कौर ने उपस्थिति दर्ज करवाई।
1999 में जब खालसा पंथ की 300वीं जयंती मनाई गई थी, तब सभी राजनीतिक दल एक साथ मंच पर रहे थे—चाहे पंजाब सरकार हो, केंद्र हो या SGPC। उस समय देशभर के विपक्षी नेता भी पंजाब पहुंचे थे। इसकी तुलना में इस बार की तस्वीर बिल्कुल बंटी हुई नजर आई।
सरकार ने 24 नवंबर को विधानसभा का विशेष सत्र भी आनंदपुर साहिब में किया, लेकिन इससे भी राजनीतिक दूरियां कम नहीं हुईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए और पंजाब नहीं आए, जिसने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दी।
अंततः सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या धार्मिक अवसर भी अब पंजाब की राजनीति में नए शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनते जा रहे हैं? जनता जहां एकता और श्रद्धा की उम्मीद करती है, वहीं बुधवार को तीन मंचों ने यह दिखा दिया कि राजनीतिक हित कितने गहरे विभाजन पैदा कर सकते हैं।
“धार्मिक अवसर समाज को जोड़ते हैं, लेकिन राजनीति जब हावी हो जाए तो एकजुटता की आवाज़ सबसे पहले पीछे छूट जाती है।”